तबले का जन्म तथा सामान्य परिचय

कुछ दर्शकों ने आश्चर्य में भरकर कहा-‘देखो कमाल हो गया। बीच में से दो बराबर हिस्सों में काट दिया है, तब भी बोल रहा है।’ कुछ दर्शक बोले-‘कट गया है, फिर भी बोला’ तो कुछ ने कहा- ‘कट गया, तब भी बोला।’ यह कोई लतीफा या चुटकला नहीं, सत्य कथा है तबले के जन्म की। तब भी बोला ही कालान्तर में संक्षिप्त रूप धारण करके तबला बन गया और साथ ही नामकरण भी हो गया इस अद्भुत ताल वाद्य का। यह सत्य है कि अन्य अधिकांश वाद्ययन्त्रों के समान ही तबले के जन्मदाता और जन्म के निश्चित काल के बारे में भी कुछ नहीं कहा जा सकता। परन्तु यह निश्चित है कि प्रथम तबले का निर्माण मुगलकाल में देश की राजधानी दिल्ली में हुआ था। दूसरी निश्चित बात यह है कि तबले का आविष्कार नहीं हुआ था, बल्कि हजारों वर्षों से हमारे देश में प्रचलित तालवाद्य मृदंग को दो भागों में काटकर इसका निर्माण किया गया था। इस बारे में तीन कहानियां प्रचलित हैं और तीनों ही धारणाओं को मानने वालों के पास इस बारे में अपने-अपने तर्क हैं।

मृदंग का जन्मदाता स्वयं भगवान् शिवजी को माना जाता है। हमारे धर्मग्रन्थों के अनुसार एक बार सत्ययुग में राक्षसराज त्रुपुरासुर तथा भगवान् शिवजी के मध्य घमासान युद्ध हुआ और कई वर्षों तक चलता रहा यह युद्ध। अन्त में राक्षसराज त्रुपुरासुर वीरगति को प्राप्त हुआ। तब भगवान् शिवजी ने युद्धभूमि की रुधिर से सनी हुई मिट्टी का एक ढोल बनाया और उसके दोनों मुंह पर चमड़ा मढ़कर इसे बजाया। यही पहला मृदंग था। यदि इसे केवल धार्मिक आख्यान मान लिया जाये, तब भी मृदंग कम-से-कम ढ़ाई हजार वर्ष पुराना वाद्ययन्त्र तो है ही। हमारे वेदों और पुराणों में अनेक स्थानों पर मृदंग के बारे में व्यापक वर्णन उपलब्ध है। नृत्य की महफिलों, मन्दिरों और धार्मिक समारोहों एवं संगीत के कार्यक्रमों में अनिवार्य रूप से बजाये जाने वाला यह मृदंग राजा-महाराजाओं की भी पहली पसन्द था। मुगलकाल में इस मृदंग को ही पखावज कहा जाने लगा और ये दोनों ही नाम आज भी समान रूप से प्रचलित हैं। इस प्रकार मृदंग, मृदंगम् और पखावज तो एक ही वाद्ययन्त्र के तीन नाम हैं, जबकि तबला भी दो भागों में विभक्त मृदंग ही है।

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